Monday, August 30, 2010

"पीप्ली लाइव".

धुवाँ है तो आग होगी ही.यहाँ धुवाँ है गीत "महंगाई डायन....." और आग है "पीप्ली लाइव".कहानी ये भी है कि निर्देशिका के ज़हन में "गोदान" के पात्र घूम रहे थे,जब उन्होंने यह पटकथा रची.(फ़िल्म के एक पात्र का नाम होरी महतो है).ख़ैर, मैंने आज फ़िल्म देखी. सबसे पहले जो दिमाग़ में कौंधा, वो था कुछ समय पूर्व रिलीज़ हुई फ़िल्म "वेल डन अब्बा" का ख़याल.दोनों फ़िल्मों के विषयों में एक तरह का साम्य है,परन्तु चर्चा की बाज़ी जीती "पीप्ली लाइव" ने. मेरी निगाह में फ़र्क बैनर का है,और मार्केटिंग का,वर्ना फ़िल्म वो भी लाजवाब थी.
पीप्ली लाइव हँसाती है,गँवय्यों की चालाकियों और उनके भोलेपन पर. रुलाती है उनकी मजबूरियों और दशा पर.चोट करती है, ख़बरचियों और उनके उद्देश्यों पर, जहाँ खबर के कारण से ज़्यादा ज़रूरी ख़ुद ख़बर हो जाती है और उससे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है खबरचियों का तथाकथित टी आर पी.फ़िल्म इशारा करती है आज की राजनीति के ख़ोख़लेपन की ओर.फ़िल्म सवाल उठाती है सरकारी योजनाओं और उनकी सार्थकता पर.
कई एक प्रसंगों ने अतिरेक को छुआ,ज़िक्र करना आवश्यक न समझते हुए कहना चाहूँगा कि एक वर्ग का दर्शक उस पर भी खुल कर हँसा.शायद यही मंशा निर्देशिका की रही हो.अनुशा की यह पहली फ़िल्म है,कुछ ख़ामियों की समीक्षा उनके जिम्मे छोड़कर हमें उम्मीद करनी चाहिये की वो आगे चलकर और भी ऐसी प्रस्तुतियाँ देंगी.