लेखक बनाम ब्लागर.
हरिशंकर परसाई का मुरीद हूँ. आजकल शरद जोशी को पढ़ रहा हूँ. फिर से . मेरे भीतर के लेखक को जगाने के लिये इतनी प्रेरणा काफ़ी होती है. ये अभिलाषा आवश्यक नहीं कि मुझे कोई पढे. मेरे हिसाब से लेखक वो है जो लिखता है, अब कोई पढे न पढे, उसकी मर्ज़ी. कई लोग ज़मीन की रजिस्टरी के वक़्त दरकार ज़रूरी कगज़ों पर लिखते हैं. वो भी लेखक हैं. जो बही खातों में लिखते हैं वो भी और जो सार्वजनिक स्थानों की दीवार पर कला प्रदर्शन करते हैं वो भी. नाना प्रकार के लेखक होते हैं ,बस उनके पढ्ने वालों का दायरा अलग अलग होता है. जब मैं बहुत ज़िद करता हूँ तो कुछ मित्र मुझे भी पढ़ लेते हैं. धुंधलके में थोड़ी ज़्यादा हो जाने पर दाद भी दे देते हैं. इस ही इंधन पर मेरी कलम चल जाती है. वो तो अछ्छा है कि माइलेज कम है,वर्ना एक दिन में कम से कम पाँच रचनाएँ तो पोस्ट कर ही देता. जग्यूड़ा साब का रिकार्ड बराबर करने को शायद इतनी काफ़ी होंगी.
इन्टर्नेट के आगमन से पहले बड़ी कठिन प्रक्रिया थी लेखक बनना. कम से कम बीस सहित्यकारों से मित्रता करो,स्तरीय लिखो, फिर लिखे हुए को स्तरीय समझने वाला प्रकाशक ढ़ूँढो, प्रकाशित होने के बाद प्रचार करो, और अगर पढ़ लिये जाओ तो आलोचनाओं का दंश झेलो. अब प्रक्रिया आसान हो गई है. लिखो और पोस्ट कर दो. मेरे जैसे लेखक के लिये मुफ़ीद परिस्थितियाँ हैं. मैं फ़ेसबुक पर ढ़िढोरा पीट सकता हूँ कि मैं कितना लायक या नालायक लेखक हूँ. दीवारें यहाँ पर भी मौजूद हैं,बस वो सार्वजनिक नहीं हैं. मैं अपना ब्लाग बना सकता हूँ,और उसमें मनमुआफ़िक माल भर सकता हूँ. आज के उपभोक्तावादी युग में, कला के वो नमूने, जिनमें बिक जाने की क़ाबिलियत है, माल कहलाते हैं.ये बात मुझे एक ब्लाग से ही पता चली. यहाँ पर प्रचार की प्रक्रिया बहुत आसान है,और मुफ़्त भी. आलोचना की सम्भावना भी बहुत कम है. आप अपने पाठक के पाठक होते हैं. आलोचना का जवाब आलोचना से दे सकते हैं. दो परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों में इस शक्ति को उपयोग न करने का अलिखित समझौता होता है. ब्लागरों की दुनिया में आलोचना ने परमाणु शक्ति का स्थानापन्न किया है. कहावत है इज़्ज़त करोगे तो इज़्ज़त पाओगे.
आप जो लिखते हो, आज ज़रूरी नहीं, कि उसका कोइ अर्थ भी हो. ये लेखन माडर्न आर्ट सरीखा होता है. आप कहेंगे, बड़ा आया माडर्न आर्ट की हाँकने वाला. पर इतना जान लीजिये, समझ में आए तो आर्ट नहीं तो माडर्न आर्ट, इतनी समझ तो मुझमें है. ये भी हो सकता है कि आप के लेखन में एक से अधिक अर्थ हों. आप कहते कुछ हों और समझे कुछ और जाते हों. पर ये खेल का हिस्सा है. अब आप ही तो अकेले बुद्धिजीवी नहीं हैं ब्लागजगत में.कई सारे हैं. जिन्हें लिखना है. माफ़ कीजिएगा, सारा समय लेखन में लग जाता है,पढ़ने की फ़ुर्सत पाना मुश्किल है.
" अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है गलत क्या और सही क्या."
Wednesday, July 7, 2010
Thursday, July 1, 2010
प्रकाश झा की "राजनीती".
पात्र : नाना पाटेकर - भीष्म पितामह.
लकवाग्रस्त - ध्रितराष्ट्र.
मारा गया पिता - पाण्डु.
मनोज बाज्पाई - दुर्योधन.
अजय देवगन - कर्ण.
अर्जुन रामपाल - युधिष्ठिर, भीम.
रणवीर कपूर - अर्जुन.
बरखा बिष्ट - कुन्ती.
नसीरुद्दीन शाह - सूर्य.
महाभारत से प्रेरित पटकथा में युद्ध का स्थान ले लिया है चुनाव ने.मुख्यमन्त्री की कुर्सी बनी राजगद्दी.महाभारत काल की तरह ही राज्य विस्तार के लिये विवाह का उपयोग हुआ.चीरहरण का स्थान ले लिया भावनात्मक उत्पीड़न ने.कर्ण पूर्व की भाँति शैशव अवस्था में नदी में बहा दिया गया और सूत पुत्र कहलाया.कालान्तर में उसने अपने मित्र दुर्योधन के साथ मिलकर अपने ही भाइयों का रक्तपात किया.कुन्ती,अभ्यर्थना के बावज़ूद फिर से कर्ण को पांडवों के खेमे में नहीं ला सकी.भीम ने गदा के स्थान पर बेसबाल के बल्ले से शत्रुओं का रक्त बहाया.मन्त्रोच्चारित बाणों की जगह ले ली रीमोट बमों ने.बड़ा बदलाव था कहानी के अन्त में द्रौपदी का राजगद्दी पर आसीन होना.
कहिये कि कहानी मौलिक थी..........
लकवाग्रस्त - ध्रितराष्ट्र.
मारा गया पिता - पाण्डु.
मनोज बाज्पाई - दुर्योधन.
अजय देवगन - कर्ण.
अर्जुन रामपाल - युधिष्ठिर, भीम.
रणवीर कपूर - अर्जुन.
बरखा बिष्ट - कुन्ती.
नसीरुद्दीन शाह - सूर्य.
महाभारत से प्रेरित पटकथा में युद्ध का स्थान ले लिया है चुनाव ने.मुख्यमन्त्री की कुर्सी बनी राजगद्दी.महाभारत काल की तरह ही राज्य विस्तार के लिये विवाह का उपयोग हुआ.चीरहरण का स्थान ले लिया भावनात्मक उत्पीड़न ने.कर्ण पूर्व की भाँति शैशव अवस्था में नदी में बहा दिया गया और सूत पुत्र कहलाया.कालान्तर में उसने अपने मित्र दुर्योधन के साथ मिलकर अपने ही भाइयों का रक्तपात किया.कुन्ती,अभ्यर्थना के बावज़ूद फिर से कर्ण को पांडवों के खेमे में नहीं ला सकी.भीम ने गदा के स्थान पर बेसबाल के बल्ले से शत्रुओं का रक्त बहाया.मन्त्रोच्चारित बाणों की जगह ले ली रीमोट बमों ने.बड़ा बदलाव था कहानी के अन्त में द्रौपदी का राजगद्दी पर आसीन होना.
कहिये कि कहानी मौलिक थी..........
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