नैनीताल में उत्तराखण्ड ट्रेडिशनल थिएटर एण्ड रिसर्च ’उत्तर’ संस्था द्वारा आयोजित द्वितीय मोबाइल फ़ोटो प्रदर्शिनी का दिनांक ७ नवम्बर २०१० को समापन हुआ.गूगल में की गयी सर्च के अनुसार भारत में इस तरह की पहली प्रदर्शिनी दिल्ली में सितम्बर २००९ में आयोजित हुई, नैनीताल में यह प्रदर्शिनी प्रथम बार अक्टूबर २००९ में आयोजित की गयी थी. इस का आयोजन नैनीताल के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री हरीश सिंह राणा द्वारा किया गया था.
प्रदर्शिनी में सेल्फ़ोन द्वारा खींचे गये चित्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था. प्रथम श्रेणी वी.जी.ए से १.३ मेगा पिक्सल, द्वितीय २ मेगा पिक्सल से ३.२ मेगा पिक्सल एवं तीसरी श्रेणी ३.२ मेगा पिक्सल से ऊपर. निर्णायक मंडल में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फोटोग्राफ़र श्री अनूप साह, सुप्रसिद्ध फोटोग्राफ़र श्री अहद तन्वीर एवं श्री हंसराज साह सम्मिलित थे. उन्होंने प्रदर्शित चित्रों को देख कर आश्चर्य जताया कि प्रतिभागी कैमरे की सीमित शक्ति से भी बहुत अच्छे परिणाम निकालने में सफ़ल रहे. प्रदर्शिनी में खूबसूरत चित्रों को देखकर दर्शकों ने ’विसिटर डायरी’ में अपनी टिप्पणियाँ भी अंकित करीं, जिन में विशेष रूप से एक प्रतिभागी श्री तेजेंद्र सिंह बिष्ट के चित्रों को सराहा गया.
मयंक साह, डोलमा गुर्रानी,उमेश काण्ड्पाल ३.२ मेगापिक्सल श्रेणी में प्रथम, द्वितीय एवं त्रितीय स्थान पर रहे.२ से ३.२ मेगापिक्सल श्रेणी में कैलाश चंद्र, नीरज तिवाड़ी और तेजेंद्र बिष्ट को यह पुरुस्कार प्राप्त हुआ. तीसरी श्रेणी में मो. साऊद हुसैन ने एक मात्र पुरुस्कार जीता.सांत्वना पुरुस्कार पाने वाले प्रतिभागियों में बीना जोशी, विनय राणा, दिनेश पालिवाल,नीरज जोशी, दर्पण कक्क्ड़,मदन मेहरा एवं प्रकाश मेहरा थे.पुरुस्कार वितरण एवं समापन समारोह का संचालन सुप्रसिद्ध कवि एवं संचालक श्री हेमंत बिष्ट द्वारा किया गया.
Monday, November 8, 2010
Monday, November 1, 2010
daayen ya baayen.
नैनीताल में आयोजित हुए फ़िल्म महोत्सव में ’दाएँ या बाएँ’ देखने का अवसर मिला.मध्यांतर तक फ़िल्म ने दाएँ या बाएँ देखने का मौका नहीं दिया, मध्यांतर के बाद भी फ़िल्म अपनी गति पकड़े रहती तो खूबसूरती और निखरती.पहाड़ और पहाड़ के जीवन के कितने ही ऐसे पहलू हैं जिन्हें ये फ़िल्म छूते हुए चलती है. बेरोज़गारी,पलायन, नशाखोरी, अन्धविश्वास, अकर्मण्यता, बेहतर शिक्षा का अभाव, पर्यावरण की अनदेखी कर प्राकृतिक संपदा का दोहन इत्यादि.यह विषय अपने आप में इतने महत्वपूर्ण हैं कि हर विषय पर एक स्वतन्त्र फ़िल्म बनाई जा सकती है.लेखिका,निर्देशिका बेला जी यहाँ पर थोड़ा लालची हो गईं, एक ही फ़िल्म में सारे विषयों को ले लिया.हाँ, हर विषय पर अपनी चुटीली टिप्पणी करने में वो जरूर सफ़ल हुईं.
सुना है कि फ़िल्म का नाम पहले ’ड्राइविंग लाईसेंस’ था, बदल कर ’दाएँ या बाएँ’ किया गया. ये नाम फ़िल्म के कथानक के साथ पूरा पूरा न्याय करता है. आखिर चुनाव करना है दो स्थितियों के बीच, पहाड़ में रहकर रोज़गार के साधन की तलाश या पलायन कर ’मनीआर्डर अर्थशास्त्र’ की यथास्थिती.पटकथा की बुनाई दर्शक को बाँधे रखने में कामयाब है.
संवाद बहुत से स्थानों पर गुदगुदाते हैं और कहीं कहीं पर खुल कर हँसने के लिये मजबूर करते हैं. कुछ स्थानों पर लगा कि संवाद यदि और पैने होते तो अच्छा होता. पहाड़ की खूबसूरती और उसके परिवेश को सटीक तरीके से कैमरे में कैद किया गया है.संगीत पारम्परिकता के और करीब होता तो फ़िल्म को एक नई ऊँचाई दे सकता था.
बेला जी ने बहुत ही हिम्मत से काम लिया, और पहाड़ की बात करने के साथ साथ पहाड़ के कलाकारों को भी सामने आने का मौका दिया. दीपक डोबरियाल तो मंझे हुए कलाकार हैं ही, बेला जी जीतेंद्र बिष्ट, भारती भट एवं बाल कलाकार प्रत्यूष से भी अच्छा काम लेने में सक्षम रहीं. ज़हूर आलम एवं धनंजय शाह को कला प्रदर्शन का भरपूर मौका नहीं मिल सका. गिर्दा तो लगा ही नहीं कि फ़िल्म के पात्र हैं, वो गिर्दा जैसे ही लगे.श्रीमती बिष्ट अपनी छोटी सी भूमिका में भी हँसाने में कामयाब रहीं.आरती ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया. सुन्दर का पात्र निभाने वाले कलाकार का नाम याद नहीं आ रहा पर उन्होंने बहुत प्रभावित किया.
बेला जी के निर्देशन में बनी यह पहली फ़िल्म साफ़ कर देती है कि उनमें एक सफ़ल एवं समर्थ निर्देशक की क्षमता है. उन्होंने फ़िल्म को अर्थोपार्जन का माध्यम न मानकर उसे अपनी बात कहने का माध्यम चुना अन्यथा किसी बाजारू विषय पर फ़िल्म बनाकर वाह वाही लूटने का आसान काम भी वो कर सकतीं थीं.उन्हें यह फ़िल्म दर्शकों तक पहुँचाने के लिये बहुत जद्दोज़हद करनी पड़ी.निर्माताओं को कहना चाहूँगा कि उनकी मानसिकता ने इस फ़िल्म को इसकी सही जगह दिलाने में नकारात्मक भूमिका निभाई. उत्तराखन्ड को केन्द्र में रख कर बनाई गई यह पहली फ़िल्म है. उत्तराखंड में सिनेमाहाँलों की क्या स्थिती ये यह जगविदित है, ऐसे में यह फ़िल्म बनाने का हौसला बेला जी का अपनी जड़ों के प्रति उनका नज़रिया प्रस्तुत करता है.उन्हें अपने आने वाले समय के लिये शुभकामनाओं के साथ साथ इस प्रस्तुती हेतु कोटि कोटि धन्यवाद.
सुना है कि फ़िल्म का नाम पहले ’ड्राइविंग लाईसेंस’ था, बदल कर ’दाएँ या बाएँ’ किया गया. ये नाम फ़िल्म के कथानक के साथ पूरा पूरा न्याय करता है. आखिर चुनाव करना है दो स्थितियों के बीच, पहाड़ में रहकर रोज़गार के साधन की तलाश या पलायन कर ’मनीआर्डर अर्थशास्त्र’ की यथास्थिती.पटकथा की बुनाई दर्शक को बाँधे रखने में कामयाब है.
संवाद बहुत से स्थानों पर गुदगुदाते हैं और कहीं कहीं पर खुल कर हँसने के लिये मजबूर करते हैं. कुछ स्थानों पर लगा कि संवाद यदि और पैने होते तो अच्छा होता. पहाड़ की खूबसूरती और उसके परिवेश को सटीक तरीके से कैमरे में कैद किया गया है.संगीत पारम्परिकता के और करीब होता तो फ़िल्म को एक नई ऊँचाई दे सकता था.
बेला जी ने बहुत ही हिम्मत से काम लिया, और पहाड़ की बात करने के साथ साथ पहाड़ के कलाकारों को भी सामने आने का मौका दिया. दीपक डोबरियाल तो मंझे हुए कलाकार हैं ही, बेला जी जीतेंद्र बिष्ट, भारती भट एवं बाल कलाकार प्रत्यूष से भी अच्छा काम लेने में सक्षम रहीं. ज़हूर आलम एवं धनंजय शाह को कला प्रदर्शन का भरपूर मौका नहीं मिल सका. गिर्दा तो लगा ही नहीं कि फ़िल्म के पात्र हैं, वो गिर्दा जैसे ही लगे.श्रीमती बिष्ट अपनी छोटी सी भूमिका में भी हँसाने में कामयाब रहीं.आरती ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया. सुन्दर का पात्र निभाने वाले कलाकार का नाम याद नहीं आ रहा पर उन्होंने बहुत प्रभावित किया.
बेला जी के निर्देशन में बनी यह पहली फ़िल्म साफ़ कर देती है कि उनमें एक सफ़ल एवं समर्थ निर्देशक की क्षमता है. उन्होंने फ़िल्म को अर्थोपार्जन का माध्यम न मानकर उसे अपनी बात कहने का माध्यम चुना अन्यथा किसी बाजारू विषय पर फ़िल्म बनाकर वाह वाही लूटने का आसान काम भी वो कर सकतीं थीं.उन्हें यह फ़िल्म दर्शकों तक पहुँचाने के लिये बहुत जद्दोज़हद करनी पड़ी.निर्माताओं को कहना चाहूँगा कि उनकी मानसिकता ने इस फ़िल्म को इसकी सही जगह दिलाने में नकारात्मक भूमिका निभाई. उत्तराखन्ड को केन्द्र में रख कर बनाई गई यह पहली फ़िल्म है. उत्तराखंड में सिनेमाहाँलों की क्या स्थिती ये यह जगविदित है, ऐसे में यह फ़िल्म बनाने का हौसला बेला जी का अपनी जड़ों के प्रति उनका नज़रिया प्रस्तुत करता है.उन्हें अपने आने वाले समय के लिये शुभकामनाओं के साथ साथ इस प्रस्तुती हेतु कोटि कोटि धन्यवाद.
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