Monday, November 1, 2010

daayen ya baayen.

नैनीताल में आयोजित हुए फ़िल्म महोत्सव में ’दाएँ या बाएँ’ देखने का अवसर मिला.मध्यांतर तक फ़िल्म ने दाएँ या बाएँ देखने का मौका नहीं दिया, मध्यांतर के बाद भी फ़िल्म अपनी गति पकड़े रहती तो खूबसूरती और निखरती.पहाड़ और पहाड़ के जीवन के कितने ही ऐसे पहलू हैं जिन्हें ये फ़िल्म छूते हुए चलती है. बेरोज़गारी,पलायन, नशाखोरी, अन्धविश्वास, अकर्मण्यता, बेहतर शिक्षा का अभाव, पर्यावरण की अनदेखी कर प्राकृतिक संपदा का दोहन इत्यादि.यह विषय अपने आप में इतने महत्वपूर्ण हैं कि हर विषय पर एक स्वतन्त्र फ़िल्म बनाई जा सकती है.लेखिका,निर्देशिका बेला जी यहाँ पर थोड़ा लालची हो गईं, एक ही फ़िल्म में सारे विषयों को ले लिया.हाँ, हर विषय पर अपनी चुटीली टिप्पणी करने में वो जरूर सफ़ल हुईं.
सुना है कि फ़िल्म का नाम पहले ’ड्राइविंग लाईसेंस’ था, बदल कर ’दाएँ या बाएँ’ किया गया. ये नाम फ़िल्म के कथानक के साथ पूरा पूरा न्याय करता है. आखिर चुनाव करना है दो स्थितियों के बीच, पहाड़ में रहकर रोज़गार के साधन की तलाश या पलायन कर ’मनीआर्डर अर्थशास्त्र’ की यथास्थिती.पटकथा की बुनाई दर्शक को बाँधे रखने में कामयाब है.
संवाद बहुत से स्थानों पर गुदगुदाते हैं और कहीं कहीं पर खुल कर हँसने के लिये मजबूर करते हैं. कुछ स्थानों पर लगा कि संवाद यदि और पैने होते तो अच्छा होता. पहाड़ की खूबसूरती और उसके परिवेश को सटीक तरीके से कैमरे में कैद किया गया है.संगीत पारम्परिकता के और करीब होता तो फ़िल्म को एक नई ऊँचाई दे सकता था.
बेला जी ने बहुत ही हिम्मत से काम लिया, और पहाड़ की बात करने के साथ साथ पहाड़ के कलाकारों को भी सामने आने का मौका दिया. दीपक डोबरियाल तो मंझे हुए कलाकार हैं ही, बेला जी जीतेंद्र बिष्ट, भारती भट एवं बाल कलाकार प्रत्यूष से भी अच्छा काम लेने में सक्षम रहीं. ज़हूर आलम एवं धनंजय शाह को कला प्रदर्शन का भरपूर मौका नहीं मिल सका. गिर्दा तो लगा ही नहीं कि फ़िल्म के पात्र हैं, वो गिर्दा जैसे ही लगे.श्रीमती बिष्ट अपनी छोटी सी भूमिका में भी हँसाने में कामयाब रहीं.आरती ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया. सुन्दर का पात्र निभाने वाले कलाकार का नाम याद नहीं आ रहा पर उन्होंने बहुत प्रभावित किया.
बेला जी के निर्देशन में बनी यह पहली फ़िल्म साफ़ कर देती है कि उनमें एक सफ़ल एवं समर्थ निर्देशक की क्षमता है. उन्होंने फ़िल्म को अर्थोपार्जन का माध्यम न मानकर उसे अपनी बात कहने का माध्यम चुना अन्यथा किसी बाजारू विषय पर फ़िल्म बनाकर वाह वाही लूटने का आसान काम भी वो कर सकतीं थीं.उन्हें यह फ़िल्म दर्शकों तक पहुँचाने के लिये बहुत जद्दोज़हद करनी पड़ी.निर्माताओं को कहना चाहूँगा कि उनकी मानसिकता ने इस फ़िल्म को इसकी सही जगह दिलाने में नकारात्मक भूमिका निभाई. उत्तराखन्ड को केन्द्र में रख कर बनाई गई यह पहली फ़िल्म है. उत्तराखंड में सिनेमाहाँलों की क्या स्थिती ये यह जगविदित है, ऐसे में यह फ़िल्म बनाने का हौसला बेला जी का अपनी जड़ों के प्रति उनका नज़रिया प्रस्तुत करता है.उन्हें अपने आने वाले समय के लिये शुभकामनाओं के साथ साथ इस प्रस्तुती हेतु कोटि कोटि धन्यवाद.

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