Monday, November 8, 2010

द्वितीय मोबाइल फ़ोटो प्रदर्शिनी

नैनीताल में उत्तराखण्ड ट्रेडिशनल थिएटर एण्ड रिसर्च ’उत्तर’ संस्था द्वारा आयोजित द्वितीय मोबाइल फ़ोटो प्रदर्शिनी का दिनांक ७ नवम्बर २०१० को समापन हुआ.गूगल में की गयी सर्च के अनुसार भारत में इस तरह की पहली प्रदर्शिनी दिल्ली में सितम्बर २००९ में आयोजित हुई, नैनीताल में यह प्रदर्शिनी प्रथम बार अक्टूबर २००९ में आयोजित की गयी थी. इस का आयोजन नैनीताल के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री हरीश सिंह राणा द्वारा किया गया था.
प्रदर्शिनी में सेल्फ़ोन द्वारा खींचे गये चित्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था. प्रथम श्रेणी वी.जी.ए से १.३ मेगा पिक्सल, द्वितीय २ मेगा पिक्सल से ३.२ मेगा पिक्सल एवं तीसरी श्रेणी ३.२ मेगा पिक्सल से ऊपर. निर्णायक मंडल में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फोटोग्राफ़र श्री अनूप साह, सुप्रसिद्ध फोटोग्राफ़र श्री अहद तन्वीर एवं श्री हंसराज साह सम्मिलित थे. उन्होंने प्रदर्शित चित्रों को देख कर आश्चर्य जताया कि प्रतिभागी कैमरे की सीमित शक्ति से भी बहुत अच्छे परिणाम निकालने में सफ़ल रहे. प्रदर्शिनी में खूबसूरत चित्रों को देखकर दर्शकों ने ’विसिटर डायरी’ में अपनी टिप्पणियाँ भी अंकित करीं, जिन में विशेष रूप से एक प्रतिभागी श्री तेजेंद्र सिंह बिष्ट के चित्रों को सराहा गया.
मयंक साह, डोलमा गुर्रानी,उमेश काण्ड्पाल ३.२ मेगापिक्सल श्रेणी में प्रथम, द्वितीय एवं त्रितीय स्थान पर रहे.२ से ३.२ मेगापिक्सल श्रेणी में कैलाश चंद्र, नीरज तिवाड़ी और तेजेंद्र बिष्ट को यह पुरुस्कार प्राप्त हुआ. तीसरी श्रेणी में मो. साऊद हुसैन ने एक मात्र पुरुस्कार जीता.सांत्वना पुरुस्कार पाने वाले प्रतिभागियों में बीना जोशी, विनय राणा, दिनेश पालिवाल,नीरज जोशी, दर्पण कक्क्ड़,मदन मेहरा एवं प्रकाश मेहरा थे.पुरुस्कार वितरण एवं समापन समारोह का संचालन सुप्रसिद्ध कवि एवं संचालक श्री हेमंत बिष्ट द्वारा किया गया.

Monday, November 1, 2010

daayen ya baayen.

नैनीताल में आयोजित हुए फ़िल्म महोत्सव में ’दाएँ या बाएँ’ देखने का अवसर मिला.मध्यांतर तक फ़िल्म ने दाएँ या बाएँ देखने का मौका नहीं दिया, मध्यांतर के बाद भी फ़िल्म अपनी गति पकड़े रहती तो खूबसूरती और निखरती.पहाड़ और पहाड़ के जीवन के कितने ही ऐसे पहलू हैं जिन्हें ये फ़िल्म छूते हुए चलती है. बेरोज़गारी,पलायन, नशाखोरी, अन्धविश्वास, अकर्मण्यता, बेहतर शिक्षा का अभाव, पर्यावरण की अनदेखी कर प्राकृतिक संपदा का दोहन इत्यादि.यह विषय अपने आप में इतने महत्वपूर्ण हैं कि हर विषय पर एक स्वतन्त्र फ़िल्म बनाई जा सकती है.लेखिका,निर्देशिका बेला जी यहाँ पर थोड़ा लालची हो गईं, एक ही फ़िल्म में सारे विषयों को ले लिया.हाँ, हर विषय पर अपनी चुटीली टिप्पणी करने में वो जरूर सफ़ल हुईं.
सुना है कि फ़िल्म का नाम पहले ’ड्राइविंग लाईसेंस’ था, बदल कर ’दाएँ या बाएँ’ किया गया. ये नाम फ़िल्म के कथानक के साथ पूरा पूरा न्याय करता है. आखिर चुनाव करना है दो स्थितियों के बीच, पहाड़ में रहकर रोज़गार के साधन की तलाश या पलायन कर ’मनीआर्डर अर्थशास्त्र’ की यथास्थिती.पटकथा की बुनाई दर्शक को बाँधे रखने में कामयाब है.
संवाद बहुत से स्थानों पर गुदगुदाते हैं और कहीं कहीं पर खुल कर हँसने के लिये मजबूर करते हैं. कुछ स्थानों पर लगा कि संवाद यदि और पैने होते तो अच्छा होता. पहाड़ की खूबसूरती और उसके परिवेश को सटीक तरीके से कैमरे में कैद किया गया है.संगीत पारम्परिकता के और करीब होता तो फ़िल्म को एक नई ऊँचाई दे सकता था.
बेला जी ने बहुत ही हिम्मत से काम लिया, और पहाड़ की बात करने के साथ साथ पहाड़ के कलाकारों को भी सामने आने का मौका दिया. दीपक डोबरियाल तो मंझे हुए कलाकार हैं ही, बेला जी जीतेंद्र बिष्ट, भारती भट एवं बाल कलाकार प्रत्यूष से भी अच्छा काम लेने में सक्षम रहीं. ज़हूर आलम एवं धनंजय शाह को कला प्रदर्शन का भरपूर मौका नहीं मिल सका. गिर्दा तो लगा ही नहीं कि फ़िल्म के पात्र हैं, वो गिर्दा जैसे ही लगे.श्रीमती बिष्ट अपनी छोटी सी भूमिका में भी हँसाने में कामयाब रहीं.आरती ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया. सुन्दर का पात्र निभाने वाले कलाकार का नाम याद नहीं आ रहा पर उन्होंने बहुत प्रभावित किया.
बेला जी के निर्देशन में बनी यह पहली फ़िल्म साफ़ कर देती है कि उनमें एक सफ़ल एवं समर्थ निर्देशक की क्षमता है. उन्होंने फ़िल्म को अर्थोपार्जन का माध्यम न मानकर उसे अपनी बात कहने का माध्यम चुना अन्यथा किसी बाजारू विषय पर फ़िल्म बनाकर वाह वाही लूटने का आसान काम भी वो कर सकतीं थीं.उन्हें यह फ़िल्म दर्शकों तक पहुँचाने के लिये बहुत जद्दोज़हद करनी पड़ी.निर्माताओं को कहना चाहूँगा कि उनकी मानसिकता ने इस फ़िल्म को इसकी सही जगह दिलाने में नकारात्मक भूमिका निभाई. उत्तराखन्ड को केन्द्र में रख कर बनाई गई यह पहली फ़िल्म है. उत्तराखंड में सिनेमाहाँलों की क्या स्थिती ये यह जगविदित है, ऐसे में यह फ़िल्म बनाने का हौसला बेला जी का अपनी जड़ों के प्रति उनका नज़रिया प्रस्तुत करता है.उन्हें अपने आने वाले समय के लिये शुभकामनाओं के साथ साथ इस प्रस्तुती हेतु कोटि कोटि धन्यवाद.

Monday, August 30, 2010

"पीप्ली लाइव".

धुवाँ है तो आग होगी ही.यहाँ धुवाँ है गीत "महंगाई डायन....." और आग है "पीप्ली लाइव".कहानी ये भी है कि निर्देशिका के ज़हन में "गोदान" के पात्र घूम रहे थे,जब उन्होंने यह पटकथा रची.(फ़िल्म के एक पात्र का नाम होरी महतो है).ख़ैर, मैंने आज फ़िल्म देखी. सबसे पहले जो दिमाग़ में कौंधा, वो था कुछ समय पूर्व रिलीज़ हुई फ़िल्म "वेल डन अब्बा" का ख़याल.दोनों फ़िल्मों के विषयों में एक तरह का साम्य है,परन्तु चर्चा की बाज़ी जीती "पीप्ली लाइव" ने. मेरी निगाह में फ़र्क बैनर का है,और मार्केटिंग का,वर्ना फ़िल्म वो भी लाजवाब थी.
पीप्ली लाइव हँसाती है,गँवय्यों की चालाकियों और उनके भोलेपन पर. रुलाती है उनकी मजबूरियों और दशा पर.चोट करती है, ख़बरचियों और उनके उद्देश्यों पर, जहाँ खबर के कारण से ज़्यादा ज़रूरी ख़ुद ख़बर हो जाती है और उससे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है खबरचियों का तथाकथित टी आर पी.फ़िल्म इशारा करती है आज की राजनीति के ख़ोख़लेपन की ओर.फ़िल्म सवाल उठाती है सरकारी योजनाओं और उनकी सार्थकता पर.
कई एक प्रसंगों ने अतिरेक को छुआ,ज़िक्र करना आवश्यक न समझते हुए कहना चाहूँगा कि एक वर्ग का दर्शक उस पर भी खुल कर हँसा.शायद यही मंशा निर्देशिका की रही हो.अनुशा की यह पहली फ़िल्म है,कुछ ख़ामियों की समीक्षा उनके जिम्मे छोड़कर हमें उम्मीद करनी चाहिये की वो आगे चलकर और भी ऐसी प्रस्तुतियाँ देंगी.

Wednesday, July 7, 2010

लेखक बनाम ब्लागर.

लेखक बनाम ब्लागर.

हरिशंकर परसाई का मुरीद हूँ. आजकल शरद जोशी को पढ़ रहा हूँ. फिर से . मेरे भीतर के लेखक को जगाने के लिये इतनी प्रेरणा काफ़ी होती है. ये अभिलाषा आवश्यक नहीं कि मुझे कोई पढे. मेरे हिसाब से लेखक वो है जो लिखता है, अब कोई पढे न पढे, उसकी मर्ज़ी. कई लोग ज़मीन की रजिस्टरी के वक़्त दरकार ज़रूरी कगज़ों पर लिखते हैं. वो भी लेखक हैं. जो बही खातों में लिखते हैं वो भी और जो सार्वजनिक स्थानों की दीवार पर कला प्रदर्शन करते हैं वो भी. नाना प्रकार के लेखक होते हैं ,बस उनके पढ्ने वालों का दायरा अलग अलग होता है. जब मैं बहुत ज़िद करता हूँ तो कुछ मित्र मुझे भी पढ़ लेते हैं. धुंधलके में थोड़ी ज़्यादा हो जाने पर दाद भी दे देते हैं. इस ही इंधन पर मेरी कलम चल जाती है. वो तो अछ्छा है कि माइलेज कम है,वर्ना एक दिन में कम से कम पाँच रचनाएँ तो पोस्ट कर ही देता. जग्यूड़ा साब का रिकार्ड बराबर करने को शायद इतनी काफ़ी होंगी.
इन्टर्नेट के आगमन से पहले बड़ी कठिन प्रक्रिया थी लेखक बनना. कम से कम बीस सहित्यकारों से मित्रता करो,स्तरीय लिखो, फिर लिखे हुए को स्तरीय समझने वाला प्रकाशक ढ़ूँढो, प्रकाशित होने के बाद प्रचार करो, और अगर पढ़ लिये जाओ तो आलोचनाओं का दंश झेलो. अब प्रक्रिया आसान हो गई है. लिखो और पोस्ट कर दो. मेरे जैसे लेखक के लिये मुफ़ीद परिस्थितियाँ हैं. मैं फ़ेसबुक पर ढ़िढोरा पीट सकता हूँ कि मैं कितना लायक या नालायक लेखक हूँ. दीवारें यहाँ पर भी मौजूद हैं,बस वो सार्वजनिक नहीं हैं. मैं अपना ब्लाग बना सकता हूँ,और उसमें मनमुआफ़िक माल भर सकता हूँ. आज के उपभोक्तावादी युग में, कला के वो नमूने, जिनमें बिक जाने की क़ाबिलियत है, माल कहलाते हैं.ये बात मुझे एक ब्लाग से ही पता चली. यहाँ पर प्रचार की प्रक्रिया बहुत आसान है,और मुफ़्त भी. आलोचना की सम्भावना भी बहुत कम है. आप अपने पाठक के पाठक होते हैं. आलोचना का जवाब आलोचना से दे सकते हैं. दो परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों में इस शक्ति को उपयोग न करने का अलिखित समझौता होता है. ब्लागरों की दुनिया में आलोचना ने परमाणु शक्ति का स्थानापन्न किया है. कहावत है इज़्ज़त करोगे तो इज़्ज़त पाओगे.
आप जो लिखते हो, आज ज़रूरी नहीं, कि उसका कोइ अर्थ भी हो. ये लेखन माडर्न आर्ट सरीखा होता है. आप कहेंगे, बड़ा आया माडर्न आर्ट की हाँकने वाला. पर इतना जान लीजिये, समझ में आए तो आर्ट नहीं तो माडर्न आर्ट, इतनी समझ तो मुझमें है. ये भी हो सकता है कि आप के लेखन में एक से अधिक अर्थ हों. आप कहते कुछ हों और समझे कुछ और जाते हों. पर ये खेल का हिस्सा है. अब आप ही तो अकेले बुद्धिजीवी नहीं हैं ब्लागजगत में.कई सारे हैं. जिन्हें लिखना है. माफ़ कीजिएगा, सारा समय लेखन में लग जाता है,पढ़ने की फ़ुर्सत पाना मुश्किल है.

" अलग हर सिम्त से दिखता है मन्ज़र,
नज़रिया है गलत क्या और सही क्या."

Thursday, July 1, 2010

प्रकाश झा की "राजनीती".

पात्र : नाना पाटेकर - भीष्म पितामह.
लकवाग्रस्त - ध्रितराष्ट्र.
मारा गया पिता - पाण्डु.
मनोज बाज्पाई - दुर्योधन.
अजय देवगन - कर्ण.
अर्जुन रामपाल - युधिष्ठिर, भीम.
रणवीर कपूर - अर्जुन.
बरखा बिष्ट - कुन्ती.
नसीरुद्दीन शाह - सूर्य.


महाभारत से प्रेरित पटकथा में युद्ध का स्थान ले लिया है चुनाव ने.मुख्यमन्त्री की कुर्सी बनी राजगद्दी.महाभारत काल की तरह ही राज्य विस्तार के लिये विवाह का उपयोग हुआ.चीरहरण का स्थान ले लिया भावनात्मक उत्पीड़न ने.कर्ण पूर्व की भाँति शैशव अवस्था में नदी में बहा दिया गया और सूत पुत्र कहलाया.कालान्तर में उसने अपने मित्र दुर्योधन के साथ मिलकर अपने ही भाइयों का रक्तपात किया.कुन्ती,अभ्यर्थना के बावज़ूद फिर से कर्ण को पांडवों के खेमे में नहीं ला सकी.भीम ने गदा के स्थान पर बेसबाल के बल्ले से शत्रुओं का रक्त बहाया.मन्त्रोच्चारित बाणों की जगह ले ली रीमोट बमों ने.बड़ा बदलाव था कहानी के अन्त में द्रौपदी का राजगद्दी पर आसीन होना.

कहिये कि कहानी मौलिक थी..........