Thursday, August 25, 2011

हम भारत के लोग.


हम भारत के लोग आपको अपना मत दान में देते हैं. हम भारत के लोग आपको इस मतदान के द्वारा अपना प्रतिनिधि चुनते हैं. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप देश की सबसे बड़ी पंचायत में हमारे हित की बात करेंगे. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप अपनी तनख्वाहें तय करने के साथ साथ हमारी उचित मजदूरी भी तय करेंगे. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप घोटालेबाजों को सज़ा दिलाकर हमारा विश्वास और मज़बूत करेंगे. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि जैसा आप कहते हैं, आप जनसेवक ही हैं, मालिक नहीं. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप हमारे मत का भी सम्मान करते हैं, केवल चुनावी मत का नहीं.

हम लोगों ने आपको कभी पार्टी के नाम पर सत्ता सौंपी और कभी जाति और मज़हब के नाम पर भी मतदान किया. आप में से कुछ लोग, कुछ अन्य लोगों को फांसीवादी कहते हैं, कुछ को कम्यूनल और कुछ को कम्यूनिस्ट. हमने सब को मौक़ा दिया. कुछ को केंद्र में और कुछ को राज्यों में. हमारी स्थिती कमोबेश वही रही और हम देखते रहे कि हमारे अधिकतर प्रतिनिधियों की स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ. हमें परिवर्तन के बहाव की दिशा का अंदाज़ा नहीं था, हमने सोचा कि सब बहावों की तरह परिवर्तन का बहाव भी ऊपर से नीचे की ओर बहता होगा. हमने धैर्य से परिवर्तन के बहाव का इन्तज़ार किया. इस इंतज़ार के दौरान हमने कई मजहबी दंगों का दंश झेला, बाढों का सामना किया, सूखा झेला, गरीबी, बेरोज़गारी झेली, किसानों की आत्महत्याएँ देखीं, पुलिस की बर्बरता झेली.

हमने संसद पर दो हमले देखे. बाहरी और भीतरी. बाहरी हमला आतंकवादियों ने किया. इस हमले को हमारे जवानों ने अपने सीने पर झेल लिया. भीतरी हमला आप ही लोगों ने किया, आपने संसद में रुपये लहराए. दिखाया कि महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर आर्थिक असर भी अपना स्थान रखता है. हमने सोचा दोषियों का नाम सामने आने पर उन्हें सज़ा मिलेगी. अभी तक तो नहीं मिली. न बाहरी हमलावरों को, न भीतरी. हमने धैर्य धारण किया. हम ट्रेनों में, चौराहों में, मंदिरों में, गलियों में और न जाने कहाँ कहाँ आतंकी निशाना बनते रहे.

हम भारत के लोगों ने देखा कि समय समय पर आप लोगों ने कई घोटाले किये, शहीदों के ताबूतओं की भी इज्ज़त आप नहीं कर पाए. उन शहीदों के नाम पर आपने मकान भी हथियाने की कुचेष्ठा की. आपने किसानों की ज़मीनें पलक झपकते कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दी. आपने विकास के नाम पर कई लोगों को बेघर कर दिया, वादा किया कि दूसरी जगह बसा देंगे पर.....

आखिर हम अपने बड़ों से ही सीखते हैं. आप हमारे रहनुमा हैं. हम भारत के लोग आपकी राह चलकर भ्रष्टाचार सीख गए. हम हर गलत या सही चीज़ के लिए घूस लेना-देना सीख गए. आज ऐसा समय आ गया है कि हम इस विधा में पारंगत हो गए हैं. हमारी सोच “सब चलता है” हो गयी है. कोई दफ्तर का बाबू जब चार मंजिली कोठी बनाता है तो हमें आश्चर्य नहीं होता. किसी १०००० रु. प्रतिमाह कमाने वाले के बच्चे जब बड़े स्कूलों में पढते हैं, तो हम कहते हैं कि बड़ी अच्छी नौकरी पा गया. हम बिजली की चोरी को अपना अधिकार समझते हैं, खाद्य सामग्री में मिलावट करते हैं, डोनेशन देकर कालेजों से डिग्रियां ले लेते हैं. कुल मिलाकर हमने खुद को व्यवस्थानुरूप ढाल लिया है.

ऐसी स्थिती में एक चौहत्तर साल का बूढा व्रत करता है कि वो आपको और हम भारत के बाकी लोगों को जगाएगा. वो राजधानी के बीचों बीच बैठ जाता है. कहता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करेगा. पहले पहल लोग विश्वास, जो कि एक विलुप्तप्राय भावना बनती जा रही है, नहीं करते. जो विश्वास करते हैं, उसके समर्थन में आ खड़े होते हैं. एक आंदोलन जन्म लेने लगता है. जैसा कि हमेशा से होता आया है, आपके आश्वासन पर यह आंदोलन स्थगित कर दिया जाता है.

आश्वासन हमेशा की तरह खरे नहीं उतरे. अब तक सब जान गए हैं कि ये बूढा आदमी हमारी फ़ौज का जवान रह चुका है, परिवार त्याग चुका है, महात्मा गाँधी के दिखाए रास्ते पर चलकर समाज सेवा का काम करता है. उसके पास अपना कुछ नहीं है. वो चाहता है कि सरकार एक ऐसा कानून बनाये जो भ्रष्टाचारियों से निबटने में सक्षम हो. उसके साथ एक युवा समाजसेवी है जो उच्च सरकारी सेवा त्याग कर ऐसे कानूनों की पैरवी करता है. उसके साथ है एक जानी-मानी भूतपूर्व पुलिस अधिकारी जिसकी बेदाग़ सेवा ने उसे समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाया है. उसके साथ है एक भूतपूर्व जज, और दो सुप्रतिष्ठित वकील पिता पुत्र. इन सब लोगों ने तय किया कि ये लोग फिर से एक आंदोलन खड़ा करेंगे. आपने इन्हें गिरफ्तार कर लिया, पर इनकी सोच पर रोक नहीं लगा पाए. आप लोग उस नीयत पर भी रोक नहीं लगा पाए, जिसने हम भारत के लोगों का विश्वास जीत लिया. लोग विरोध में सड़कों पर उतर आये. अपने व्रत के पक्के, उस बूढ़े सिपाही ने जेल में ही अनशन शुरू किया, और हम भारत के लोगों को निर्देश दिया कि अहिंसा का साथ हमें नहीं छोड़ना है.

हम भारत के लोगों ने अक्षरशः उनके आदेश का पालन किया, और देश के हर हिस्से में उनके समर्थन में अहिंसात्मक प्रदर्शन किया. आपने उन्हें जेल से रिहा किया, पर वो बाहर नहीं आये. दो दिन और बीतने पर जब बाहर आये तो हम भारत के लोग पलक-पांवड़े बिछाकर उनके स्वागत के लिए तैयार थे. हर तबके के लोग. उत्सुक लोग, आशंकित लोग, आशावान लोग, व्यथित लोग. दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अनशन १० दिनों तक चला. आज आप लोगों ने, आशंकित होकर, सोच समझकर, प्रतिक्रियास्वरूप या जाने द्रवित होकर, सामूहिक रूप से इस बूढ़े से अपना व्रत तोड़ने की विनती की है. आपने वादा किया है कि आप हम भारत के लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, कल से ही, महापंचायत में, इस कानून पर चर्चा करेंगे. जल्दी से जल्दी कानून लागू करने की भी चेष्ठा करेंगे. ऐसा आंदोलन पहली बार हुआ है. ऐसा वादा भी पहली बार किया गया है. ये तो स्पष्ट है कि देश में अब भी जनतंत्र की जड़ें मज़बूत हैं. जन जागे तो उसके मत की कीमत भी है. आशा है जन जागा रहेगा और न सिर्फ नए भारत को निर्मित होते देखेगा वरन इस निर्माण में भागीदार भी होगा. अन्ना जी, टीम अन्ना, शुक्रिया आत्माओं को खटखटाने और जगाने के लिए.

Sunday, August 21, 2011

१५ अगस्त २०११.

इस बार १५ अगस्त जैसे १५ अगस्त को शुरू हुआ. आज १८ अगस्त की शाम है पर अभी तक चल रहा है. शायद इस बार आज़ादी का हफ्ता या पखवाड़ा या महीना ही मनाया जाये. लोग इस बार आज़ादी मना ही नहीं रहे, आज़ादी माँग भी रहे हैं. अपने-आप से. कोई मकड़ी जैसे अपने ही जाले से निकलने को छटपटा रही हो. इस जाले को झाड़ देना आसान लगता है, आसान है भी, सिवा इस मुश्किल के कि इस जाले में फंसा शिकार भी जाले के साथ झड़ जाता है. मकड़ी नया जाला बुनने का श्रम तो करने को तैयार है पर पुराने जाले में फँसे शिकार का लोभ संवरण नहीं कर पा रही.

खैर, मेरा विषय ये नहीं है. मेरा विषय है “जन लोकपाल आंदोलन”. आजकल भारतदेश में ये आंदोलन चल रहा है. एक पुराना सिपाही, कुछ चार महीने पहले दिल्ली के जंतर मंतर पर आकर बोला कि ये लोकशाही है, लोगों की सरकार. बोला कि ये विधायक, मन्त्री, अफसर और बाबू सब्ब.. लोगों के नौकर हैं, मालिक नहीं. बोला कि सरकार से मैं कुछ नहीं माँगता, वो कुछ दे ही नहीं सकती. उसके पास तो कुछ है ही नहीं देने को. जो है सब जनता का है, सरकार सिर्फ चौकीदार है. बोला कि मैं अन्न त्यागकर सत्याग्रह करूँगा. बहुत लोगों ने कहा “गांधी वादी” है, कुछ ने कहा नौटंकी है.

सरकार उन दिनों कुछ अनाड़ी मंत्रियों के कारनामों को झेल रही थी. खेल घोटाला, टू जी घोटाला, आदर्श घोटाला, ये घोटाला, वो घोटाला. महँगाई से जूझती जनता ये सब न्यूज़ में सुनती और एक दूसरे से कहती बताती, पर दबे शब्दों में. जनता के ध्यान को इस पुराने सिपाही ने आकर्षित किया और सरकार का ध्यान चौबीस घंटे बाद जनता ने खींचा, जो भारी तादाद में, अपनी बात एक दूसरे को चीखकर बताने के लिए इस पुराने सिपाही के चारों ओर इकठ्ठी हो गयी. सरकार का ध्यान गया तो पता चला कि आर टी आई कानून को लागू करवाने वाले, महाराष्ट्र के मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर करने वाले, रालेगण सिद्धी गाँव को एक नई शक्ल देने वाले एक पुराने सिपाही ने इस बार “जन लोकपाल बिल” को पारित करवाने का संकल्प लिया है. वो जंतर मंतर, दिल्ली में आ बैठा है, और उसको घेरे बैठे हैं देश के तमाम लोग. लोगों को घेर रखा है मीडिया के कैमरों ने. टी वी पर देख रही है सारी दुनिया.

सरकार ने कहा, यूँ सरे-आम रुसवा ना करो. हम भी उसी रास्ते के मुसाफिर हैं जिसके तुम हो. हम खुद ही भ्रष्टाचार से बेहाल हैं, हम तो खुद ही ये बिल लाना चाहते हैं. चलो “अन्ना”, बैठ कर बात कर लेते हैं. अन्ना बोले, “पहले लिखकर दो बात मानोगे”. अब तक लोग देश के बाकी शहरों में भी चीखकर अपनी बात कहने इकठ्ठा हो रहे थे. सरकार ने समझदारी से काम लेते हुए लिखकर दे दिया. ड्राफ्टिंग कमिटी बना दी गयी. सरकार की बला टल गयी.

कमिटी बात कर ही रही थी कि इधर योग गुरु बाबा रामदेव भ्रष्टाचार और विदेशी धन का मुद्दा लेकर रामलीला मैदान, दिल्ली में अनशन पर बैठ गए. सरकार इस बार चुस्त थी. उसने कहा कि बाबा योग दीक्षा के बहाने जगह ले कर अनशन नहीं कर सकता. कहा कि बाबा झूठ बोल रहा है कि अनशन बेमियादी है. वो तो पहले ही तीन दिन में अनशन तोड़ने का लिखित प्रस्ताव सरकार को दे चुका है. बाबा सफाई देते रहे. बात अभी साफ़ भी नहीं हुई थी कि सरकार ने, सौरी, प्रशासन ने, लाठी डंडों से एकत्रित सभा को खदेडना शुरू कर दिया. रात का समय था. ये लोग तब सोए हुए थे. बाबा ने मातृ शक्ति को अपनी सुरक्षा के भीतरी घेरे में रहने का निर्देश दिया, और पुरुषों को बाहरी. उन्होंने कहा कि ये उनकी ह्त्या की साज़िश है. इस साज़िश के चक्रव्यूह से वो औरतों के लिबास में निकले. कैमरों ने देख लिया था. सरकार, सौरी, पुलिस, उन्हें गिरफ्तार करके उनके हरिद्वार स्थित आश्रम में छोड़ आई. उन्होंने वहीं अनशन करते हुए कहा कि वो एक सशस्त्र फ़ौज बनाएंगे. लोगों ने कहा, वही दबे छुपे, “क्या फ़ौज की वर्दी जनाना होगी?”.

अन्ना इस बर्बर सरकारी कार्यवाही के विरोध में फिर धरने पर जा बैठे. भा ज पा राजघाट पर जा बैठी और विरोध जताया. इस विरोध के दौरान सुषमा स्वराज जी देशभक्ति के गीत की लय पर नृत्य कर बैठीं. कांग्रेस ने इस पर विरोध जताया, कहा , “बापू की समाधी पर नृत्य.....तौबा तौबा”. बाबा रामदेव अनशन करते करते आई सी यू में पहुँच गए. सरकार का इन्तज़ार करते करते थक चुके बाबा ने श्री श्री रविशंकर और अन्य आध्यात्मिक गुरुओं के आग्रह पर अपना अनशन तोड़ा. कहा आंदोलन जारी रहेगा.

सरकार असंतुष्ट अन्ना से बात करती रही. इस बीच दिग्विजय सिंह उनके सहयोगियों पर लांछन लगाते रहे. एक सी डी चर्चा में रही, जिसमें तथाकथित रूप से अन्ना के सहयोगियों भूषण पिता-पुत्र पर मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के साथ गठजोड़ का आरोप लगा. जांच हुई, सी डी कभी असली कभी नकली साबित होती रही. पता चला कि ये वो ही साहब हैं जिन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ वो केस लड़ा था जिसे हारने के कारण वो संसद की सदस्यता से वंचित कर दी गयी थीं. परिणामस्वरूप उन्हें आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी. खैर, अन्ना ने कहा कि उनकी पूरी टीम साथ है, और यदि सरकार ने उनके जन लोकपाल बिल को पास नहीं किया तो १६ अगस्त से वो फिर जंतर-मंतर पर बैठ जाएंगे.

सरकार, सौरी, पुलिस प्रशासन, ने उन्हें कहा कि जंतर मंतर पर अनशन की इजाज़त नहीं मिलेगी. दिल्ली में धारा १४४ लागू है. वो जे पी पार्क में बैठें. इस से पहले कि वो बैठते, उन्हें घर से ही उठा लिया गया और पहुंचा दिया गया तिहाड जेल. बाकी साथी भी धर लिए गए. अन्ना ने कहा जेल भरो आन्दोलन होगा. अन्ना पर माननीय मंत्री महोदय श्री कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि अन्ना ‘पब्लिसिटी’ के लिए अनशन कर रहे हैं और मीडिया के कैमरों से घिरे रहना चाहते हैं. लोगों ने तिहाड़ जेल को घेर लिया और अपना विरोध दर्ज कराया. देश के हर हिस्से से खबर आयी कि लोग ऐसे ही इकठ्ठा होकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. सरकार ने जनभावना का “सम्मान” करते हुए, श्री राहुल गांधी के आग्रह पर, अन्ना सहयोगियों को रिहा कर दिया. अन्ना भी रिहा किये गए पर उन्होंने जेल छोडने से इनकार कर दिया. वो कैमरों के सामने नहीं आये. सरकार मोल भाव करती रही और अंत-पंत उसने अन्ना को रामलीला मैदान पर १५ दिनों का अनशन करने की इजाज़त दे दी. वो बात अलग कि तब तक जनता इंडिया गेट, तिहाड़ जेल और सारे देश के चौराहों और गली मुहल्लों में निकल आयी थी. विद्यार्थी, शिक्षक, वकील, कर्मचारी, मजदूर, व्यवसायी, सभी वर्गों के लोग अन्ना को अपना समर्थन देने सड़कों पर निकल आये. १८ अगस्त को अन्ना जेल से निकले, राजघाट गए, और अपार जनसमूह के साथ रामलीला मैदान में अनशन पर बैठ गए, भारी बारिश के बीच.

आज २१ अगस्त है.१५ अगस्त मनाते मनाते देश को एक हफ्ता हो गया है. भारत का सारा मीडिया तंत्र अन्ना और उनके आंदोलन की बात कर रहा है. विदेशों के प्रतिष्ठित समाचार पत्र और अन्य मीडिया ने भी इस आंदोलन को अभूतपूर्व बताया है. जनसैलाब के बीच अनशनरत अन्ना कहते हैं कि देश का युवा जागृत हो गया है, वो शांतिपूर्ण आंदोलन करके पूरे विश्व को एक नया रास्ता दिखा रहा है. अब परिवर्तन दूर नहीं. टेलीविज़न चैनल “जनलोकपाल” के विषय में बुद्धिजीवियों की विचारगोष्ठियां आयोजित कर रहे हैं. बुद्धिजीविओं का अलग अलग मत है. कुछ कहते हैं कि ये लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली की खिल्ली उड़ाना है, कुछ कहते हैं कि बिल को पास करने की समयबद्धता की जिद अन्ना ने नहीं करनी चाहिए. कुछ मत हैं कि ये एक ऐसे अनियंत्रित तानाशाह जनलोकपाल को को जन्म देने की कोशिश है जो न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका पर एक साथ नियंत्रण करेगा. सरकार आंदोलन को नया रंग देने की कोशिश कर रही है. उसका कहना है कि ये आंदोलन सरकार बनाम जनता न होकर संसद बनाम जनता है. शायद वो सभी सभी सांसदों को आंदोलन के खिलाफ लामबंद करना चाहती है. उसका कहना है कि ये आंदोलन सरकार विरुद्ध न होकर व्यवस्था विरुद्ध है. अन्ना के प्रमुख सहयोगी श्री अरविन्द केजरीवाल मंच पर कह भी चुके हैं, “हम सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं”. उनका कहना है कि हमारा तंत्र पूरी तरह सड़ चुका है और सडांध की बू से लोग बेहाल हैं. देखना ये है कि क्या लोग, जो जनतंत्र का मूल हैं, व्यवस्था परिवर्तन की सोच और शक्ति रखते हैं या नहीं.

Saturday, February 5, 2011

LAHRON KE RAJHANS by MOHAN RAKESH.






DIRECTED BY RITESH SAGAR.
A BABA ENTERTAINMENTS PRESENTATION.