Sunday, August 21, 2011

१५ अगस्त २०११.

इस बार १५ अगस्त जैसे १५ अगस्त को शुरू हुआ. आज १८ अगस्त की शाम है पर अभी तक चल रहा है. शायद इस बार आज़ादी का हफ्ता या पखवाड़ा या महीना ही मनाया जाये. लोग इस बार आज़ादी मना ही नहीं रहे, आज़ादी माँग भी रहे हैं. अपने-आप से. कोई मकड़ी जैसे अपने ही जाले से निकलने को छटपटा रही हो. इस जाले को झाड़ देना आसान लगता है, आसान है भी, सिवा इस मुश्किल के कि इस जाले में फंसा शिकार भी जाले के साथ झड़ जाता है. मकड़ी नया जाला बुनने का श्रम तो करने को तैयार है पर पुराने जाले में फँसे शिकार का लोभ संवरण नहीं कर पा रही.

खैर, मेरा विषय ये नहीं है. मेरा विषय है “जन लोकपाल आंदोलन”. आजकल भारतदेश में ये आंदोलन चल रहा है. एक पुराना सिपाही, कुछ चार महीने पहले दिल्ली के जंतर मंतर पर आकर बोला कि ये लोकशाही है, लोगों की सरकार. बोला कि ये विधायक, मन्त्री, अफसर और बाबू सब्ब.. लोगों के नौकर हैं, मालिक नहीं. बोला कि सरकार से मैं कुछ नहीं माँगता, वो कुछ दे ही नहीं सकती. उसके पास तो कुछ है ही नहीं देने को. जो है सब जनता का है, सरकार सिर्फ चौकीदार है. बोला कि मैं अन्न त्यागकर सत्याग्रह करूँगा. बहुत लोगों ने कहा “गांधी वादी” है, कुछ ने कहा नौटंकी है.

सरकार उन दिनों कुछ अनाड़ी मंत्रियों के कारनामों को झेल रही थी. खेल घोटाला, टू जी घोटाला, आदर्श घोटाला, ये घोटाला, वो घोटाला. महँगाई से जूझती जनता ये सब न्यूज़ में सुनती और एक दूसरे से कहती बताती, पर दबे शब्दों में. जनता के ध्यान को इस पुराने सिपाही ने आकर्षित किया और सरकार का ध्यान चौबीस घंटे बाद जनता ने खींचा, जो भारी तादाद में, अपनी बात एक दूसरे को चीखकर बताने के लिए इस पुराने सिपाही के चारों ओर इकठ्ठी हो गयी. सरकार का ध्यान गया तो पता चला कि आर टी आई कानून को लागू करवाने वाले, महाराष्ट्र के मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर करने वाले, रालेगण सिद्धी गाँव को एक नई शक्ल देने वाले एक पुराने सिपाही ने इस बार “जन लोकपाल बिल” को पारित करवाने का संकल्प लिया है. वो जंतर मंतर, दिल्ली में आ बैठा है, और उसको घेरे बैठे हैं देश के तमाम लोग. लोगों को घेर रखा है मीडिया के कैमरों ने. टी वी पर देख रही है सारी दुनिया.

सरकार ने कहा, यूँ सरे-आम रुसवा ना करो. हम भी उसी रास्ते के मुसाफिर हैं जिसके तुम हो. हम खुद ही भ्रष्टाचार से बेहाल हैं, हम तो खुद ही ये बिल लाना चाहते हैं. चलो “अन्ना”, बैठ कर बात कर लेते हैं. अन्ना बोले, “पहले लिखकर दो बात मानोगे”. अब तक लोग देश के बाकी शहरों में भी चीखकर अपनी बात कहने इकठ्ठा हो रहे थे. सरकार ने समझदारी से काम लेते हुए लिखकर दे दिया. ड्राफ्टिंग कमिटी बना दी गयी. सरकार की बला टल गयी.

कमिटी बात कर ही रही थी कि इधर योग गुरु बाबा रामदेव भ्रष्टाचार और विदेशी धन का मुद्दा लेकर रामलीला मैदान, दिल्ली में अनशन पर बैठ गए. सरकार इस बार चुस्त थी. उसने कहा कि बाबा योग दीक्षा के बहाने जगह ले कर अनशन नहीं कर सकता. कहा कि बाबा झूठ बोल रहा है कि अनशन बेमियादी है. वो तो पहले ही तीन दिन में अनशन तोड़ने का लिखित प्रस्ताव सरकार को दे चुका है. बाबा सफाई देते रहे. बात अभी साफ़ भी नहीं हुई थी कि सरकार ने, सौरी, प्रशासन ने, लाठी डंडों से एकत्रित सभा को खदेडना शुरू कर दिया. रात का समय था. ये लोग तब सोए हुए थे. बाबा ने मातृ शक्ति को अपनी सुरक्षा के भीतरी घेरे में रहने का निर्देश दिया, और पुरुषों को बाहरी. उन्होंने कहा कि ये उनकी ह्त्या की साज़िश है. इस साज़िश के चक्रव्यूह से वो औरतों के लिबास में निकले. कैमरों ने देख लिया था. सरकार, सौरी, पुलिस, उन्हें गिरफ्तार करके उनके हरिद्वार स्थित आश्रम में छोड़ आई. उन्होंने वहीं अनशन करते हुए कहा कि वो एक सशस्त्र फ़ौज बनाएंगे. लोगों ने कहा, वही दबे छुपे, “क्या फ़ौज की वर्दी जनाना होगी?”.

अन्ना इस बर्बर सरकारी कार्यवाही के विरोध में फिर धरने पर जा बैठे. भा ज पा राजघाट पर जा बैठी और विरोध जताया. इस विरोध के दौरान सुषमा स्वराज जी देशभक्ति के गीत की लय पर नृत्य कर बैठीं. कांग्रेस ने इस पर विरोध जताया, कहा , “बापू की समाधी पर नृत्य.....तौबा तौबा”. बाबा रामदेव अनशन करते करते आई सी यू में पहुँच गए. सरकार का इन्तज़ार करते करते थक चुके बाबा ने श्री श्री रविशंकर और अन्य आध्यात्मिक गुरुओं के आग्रह पर अपना अनशन तोड़ा. कहा आंदोलन जारी रहेगा.

सरकार असंतुष्ट अन्ना से बात करती रही. इस बीच दिग्विजय सिंह उनके सहयोगियों पर लांछन लगाते रहे. एक सी डी चर्चा में रही, जिसमें तथाकथित रूप से अन्ना के सहयोगियों भूषण पिता-पुत्र पर मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के साथ गठजोड़ का आरोप लगा. जांच हुई, सी डी कभी असली कभी नकली साबित होती रही. पता चला कि ये वो ही साहब हैं जिन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ वो केस लड़ा था जिसे हारने के कारण वो संसद की सदस्यता से वंचित कर दी गयी थीं. परिणामस्वरूप उन्हें आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी. खैर, अन्ना ने कहा कि उनकी पूरी टीम साथ है, और यदि सरकार ने उनके जन लोकपाल बिल को पास नहीं किया तो १६ अगस्त से वो फिर जंतर-मंतर पर बैठ जाएंगे.

सरकार, सौरी, पुलिस प्रशासन, ने उन्हें कहा कि जंतर मंतर पर अनशन की इजाज़त नहीं मिलेगी. दिल्ली में धारा १४४ लागू है. वो जे पी पार्क में बैठें. इस से पहले कि वो बैठते, उन्हें घर से ही उठा लिया गया और पहुंचा दिया गया तिहाड जेल. बाकी साथी भी धर लिए गए. अन्ना ने कहा जेल भरो आन्दोलन होगा. अन्ना पर माननीय मंत्री महोदय श्री कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि अन्ना ‘पब्लिसिटी’ के लिए अनशन कर रहे हैं और मीडिया के कैमरों से घिरे रहना चाहते हैं. लोगों ने तिहाड़ जेल को घेर लिया और अपना विरोध दर्ज कराया. देश के हर हिस्से से खबर आयी कि लोग ऐसे ही इकठ्ठा होकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. सरकार ने जनभावना का “सम्मान” करते हुए, श्री राहुल गांधी के आग्रह पर, अन्ना सहयोगियों को रिहा कर दिया. अन्ना भी रिहा किये गए पर उन्होंने जेल छोडने से इनकार कर दिया. वो कैमरों के सामने नहीं आये. सरकार मोल भाव करती रही और अंत-पंत उसने अन्ना को रामलीला मैदान पर १५ दिनों का अनशन करने की इजाज़त दे दी. वो बात अलग कि तब तक जनता इंडिया गेट, तिहाड़ जेल और सारे देश के चौराहों और गली मुहल्लों में निकल आयी थी. विद्यार्थी, शिक्षक, वकील, कर्मचारी, मजदूर, व्यवसायी, सभी वर्गों के लोग अन्ना को अपना समर्थन देने सड़कों पर निकल आये. १८ अगस्त को अन्ना जेल से निकले, राजघाट गए, और अपार जनसमूह के साथ रामलीला मैदान में अनशन पर बैठ गए, भारी बारिश के बीच.

आज २१ अगस्त है.१५ अगस्त मनाते मनाते देश को एक हफ्ता हो गया है. भारत का सारा मीडिया तंत्र अन्ना और उनके आंदोलन की बात कर रहा है. विदेशों के प्रतिष्ठित समाचार पत्र और अन्य मीडिया ने भी इस आंदोलन को अभूतपूर्व बताया है. जनसैलाब के बीच अनशनरत अन्ना कहते हैं कि देश का युवा जागृत हो गया है, वो शांतिपूर्ण आंदोलन करके पूरे विश्व को एक नया रास्ता दिखा रहा है. अब परिवर्तन दूर नहीं. टेलीविज़न चैनल “जनलोकपाल” के विषय में बुद्धिजीवियों की विचारगोष्ठियां आयोजित कर रहे हैं. बुद्धिजीविओं का अलग अलग मत है. कुछ कहते हैं कि ये लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली की खिल्ली उड़ाना है, कुछ कहते हैं कि बिल को पास करने की समयबद्धता की जिद अन्ना ने नहीं करनी चाहिए. कुछ मत हैं कि ये एक ऐसे अनियंत्रित तानाशाह जनलोकपाल को को जन्म देने की कोशिश है जो न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका पर एक साथ नियंत्रण करेगा. सरकार आंदोलन को नया रंग देने की कोशिश कर रही है. उसका कहना है कि ये आंदोलन सरकार बनाम जनता न होकर संसद बनाम जनता है. शायद वो सभी सभी सांसदों को आंदोलन के खिलाफ लामबंद करना चाहती है. उसका कहना है कि ये आंदोलन सरकार विरुद्ध न होकर व्यवस्था विरुद्ध है. अन्ना के प्रमुख सहयोगी श्री अरविन्द केजरीवाल मंच पर कह भी चुके हैं, “हम सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं”. उनका कहना है कि हमारा तंत्र पूरी तरह सड़ चुका है और सडांध की बू से लोग बेहाल हैं. देखना ये है कि क्या लोग, जो जनतंत्र का मूल हैं, व्यवस्था परिवर्तन की सोच और शक्ति रखते हैं या नहीं.

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