हम भारत के लोग आपको अपना मत दान में देते हैं. हम भारत के लोग आपको इस मतदान के द्वारा अपना प्रतिनिधि चुनते हैं. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप देश की सबसे बड़ी पंचायत में हमारे हित की बात करेंगे. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप अपनी तनख्वाहें तय करने के साथ साथ हमारी उचित मजदूरी भी तय करेंगे. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप घोटालेबाजों को सज़ा दिलाकर हमारा विश्वास और मज़बूत करेंगे. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि जैसा आप कहते हैं, आप जनसेवक ही हैं, मालिक नहीं. हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप हमारे मत का भी सम्मान करते हैं, केवल चुनावी मत का नहीं.
हम लोगों ने आपको कभी पार्टी के नाम पर सत्ता सौंपी और कभी जाति और मज़हब के नाम पर भी मतदान किया. आप में से कुछ लोग, कुछ अन्य लोगों को फांसीवादी कहते हैं, कुछ को कम्यूनल और कुछ को कम्यूनिस्ट. हमने सब को मौक़ा दिया. कुछ को केंद्र में और कुछ को राज्यों में. हमारी स्थिती कमोबेश वही रही और हम देखते रहे कि हमारे अधिकतर प्रतिनिधियों की स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ. हमें परिवर्तन के बहाव की दिशा का अंदाज़ा नहीं था, हमने सोचा कि सब बहावों की तरह परिवर्तन का बहाव भी ऊपर से नीचे की ओर बहता होगा. हमने धैर्य से परिवर्तन के बहाव का इन्तज़ार किया. इस इंतज़ार के दौरान हमने कई मजहबी दंगों का दंश झेला, बाढों का सामना किया, सूखा झेला, गरीबी, बेरोज़गारी झेली, किसानों की आत्महत्याएँ देखीं, पुलिस की बर्बरता झेली.
हमने संसद पर दो हमले देखे. बाहरी और भीतरी. बाहरी हमला आतंकवादियों ने किया. इस हमले को हमारे जवानों ने अपने सीने पर झेल लिया. भीतरी हमला आप ही लोगों ने किया, आपने संसद में रुपये लहराए. दिखाया कि महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर आर्थिक असर भी अपना स्थान रखता है. हमने सोचा दोषियों का नाम सामने आने पर उन्हें सज़ा मिलेगी. अभी तक तो नहीं मिली. न बाहरी हमलावरों को, न भीतरी. हमने धैर्य धारण किया. हम ट्रेनों में, चौराहों में, मंदिरों में, गलियों में और न जाने कहाँ कहाँ आतंकी निशाना बनते रहे.
हम भारत के लोगों ने देखा कि समय समय पर आप लोगों ने कई घोटाले किये, शहीदों के ताबूतओं की भी इज्ज़त आप नहीं कर पाए. उन शहीदों के नाम पर आपने मकान भी हथियाने की कुचेष्ठा की. आपने किसानों की ज़मीनें पलक झपकते कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दी. आपने विकास के नाम पर कई लोगों को बेघर कर दिया, वादा किया कि दूसरी जगह बसा देंगे पर.....
आखिर हम अपने बड़ों से ही सीखते हैं. आप हमारे रहनुमा हैं. हम भारत के लोग आपकी राह चलकर भ्रष्टाचार सीख गए. हम हर गलत या सही चीज़ के लिए घूस लेना-देना सीख गए. आज ऐसा समय आ गया है कि हम इस विधा में पारंगत हो गए हैं. हमारी सोच “सब चलता है” हो गयी है. कोई दफ्तर का बाबू जब चार मंजिली कोठी बनाता है तो हमें आश्चर्य नहीं होता. किसी १०००० रु. प्रतिमाह कमाने वाले के बच्चे जब बड़े स्कूलों में पढते हैं, तो हम कहते हैं कि बड़ी अच्छी नौकरी पा गया. हम बिजली की चोरी को अपना अधिकार समझते हैं, खाद्य सामग्री में मिलावट करते हैं, डोनेशन देकर कालेजों से डिग्रियां ले लेते हैं. कुल मिलाकर हमने खुद को व्यवस्थानुरूप ढाल लिया है.
ऐसी स्थिती में एक चौहत्तर साल का बूढा व्रत करता है कि वो आपको और हम भारत के बाकी लोगों को जगाएगा. वो राजधानी के बीचों बीच बैठ जाता है. कहता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करेगा. पहले पहल लोग विश्वास, जो कि एक विलुप्तप्राय भावना बनती जा रही है, नहीं करते. जो विश्वास करते हैं, उसके समर्थन में आ खड़े होते हैं. एक आंदोलन जन्म लेने लगता है. जैसा कि हमेशा से होता आया है, आपके आश्वासन पर यह आंदोलन स्थगित कर दिया जाता है.
आश्वासन हमेशा की तरह खरे नहीं उतरे. अब तक सब जान गए हैं कि ये बूढा आदमी हमारी फ़ौज का जवान रह चुका है, परिवार त्याग चुका है, महात्मा गाँधी के दिखाए रास्ते पर चलकर समाज सेवा का काम करता है. उसके पास अपना कुछ नहीं है. वो चाहता है कि सरकार एक ऐसा कानून बनाये जो भ्रष्टाचारियों से निबटने में सक्षम हो. उसके साथ एक युवा समाजसेवी है जो उच्च सरकारी सेवा त्याग कर ऐसे कानूनों की पैरवी करता है. उसके साथ है एक जानी-मानी भूतपूर्व पुलिस अधिकारी जिसकी बेदाग़ सेवा ने उसे समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाया है. उसके साथ है एक भूतपूर्व जज, और दो सुप्रतिष्ठित वकील पिता पुत्र. इन सब लोगों ने तय किया कि ये लोग फिर से एक आंदोलन खड़ा करेंगे. आपने इन्हें गिरफ्तार कर लिया, पर इनकी सोच पर रोक नहीं लगा पाए. आप लोग उस नीयत पर भी रोक नहीं लगा पाए, जिसने हम भारत के लोगों का विश्वास जीत लिया. लोग विरोध में सड़कों पर उतर आये. अपने व्रत के पक्के, उस बूढ़े सिपाही ने जेल में ही अनशन शुरू किया, और हम भारत के लोगों को निर्देश दिया कि अहिंसा का साथ हमें नहीं छोड़ना है.
हम भारत के लोगों ने अक्षरशः उनके आदेश का पालन किया, और देश के हर हिस्से में उनके समर्थन में अहिंसात्मक प्रदर्शन किया. आपने उन्हें जेल से रिहा किया, पर वो बाहर नहीं आये. दो दिन और बीतने पर जब बाहर आये तो हम भारत के लोग पलक-पांवड़े बिछाकर उनके स्वागत के लिए तैयार थे. हर तबके के लोग. उत्सुक लोग, आशंकित लोग, आशावान लोग, व्यथित लोग. दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अनशन १० दिनों तक चला. आज आप लोगों ने, आशंकित होकर, सोच समझकर, प्रतिक्रियास्वरूप या जाने द्रवित होकर, सामूहिक रूप से इस बूढ़े से अपना व्रत तोड़ने की विनती की है. आपने वादा किया है कि आप हम भारत के लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, कल से ही, महापंचायत में, इस कानून पर चर्चा करेंगे. जल्दी से जल्दी कानून लागू करने की भी चेष्ठा करेंगे. ऐसा आंदोलन पहली बार हुआ है. ऐसा वादा भी पहली बार किया गया है. ये तो स्पष्ट है कि देश में अब भी जनतंत्र की जड़ें मज़बूत हैं. जन जागे तो उसके मत की कीमत भी है. आशा है जन जागा रहेगा और न सिर्फ नए भारत को निर्मित होते देखेगा वरन इस निर्माण में भागीदार भी होगा. अन्ना जी, टीम अन्ना, शुक्रिया आत्माओं को खटखटाने और जगाने के लिए.
The promises are not believable...broken several times earlier. Lats see if the bill gets a discussion in parliament. Actually no political party or political figure wants this bill to be implied as they all are stained....and are in politics to earn power & fortune only.
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